इमरजेंसी से लेकर आज के दौर तक बदलती अभिव्यक्ति की आज़ादी



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"तुमसे पहले वो जो एक शख्स यहां तख़्त नशीं था

उसको भी अपने खुदा होने का इतना ही यकीं था "

दोस्तों मशहूर शायर हबीब जलील की इन्ही पंक्तियों के माध्यम से 40  वर्षो पूर्व देश के लोगो पर थोपी गयी  21  माह   की इमरजेंसी से लेकर आज के दौर में भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे  एवं तथाकथित गौ  रक्षको द्वारा धर्म की आड़ मैं  एक व्यक्ति की पीट पीट के जान लेने तक वही विपक्ष की विरोध के नाम पर किसी धर्म के आस्था को ठेस पहुंचा कर खुलेआम बीफ  को खाने की इस राजनीतिक महत्वकांशा को समझते है एवं अपने आप को इस बदलते न्यू इंडिया की स्कीम में कहा खड़ा मह्सूस करते है इस बात को आज के लेख के बारे में समझेंगे ! बात 70  के दशक के उस मध्य काल के राजनीतिक उथल पुथल   की है जब मैं और आप में से  नयी पीढ़ी के  लोग इस धरती पर नहीं थे  और सत्ता की चाहत में  सरकार ने लोगो पर इमरजेंसी थोप कर विरोध पक्ष के लोगो को जेल में डाल दिया ! तब अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर हवालात मिली कुछ 22 लोग तो उसी में स्वर्ग सिधार गए ! स्वतंत्र लिखने और विरोध की हर आवाज़ को दबाने के उस दौर को आप शायद नहीं जानते हो परन्तु कभी बुजुर्गो से उस दौर की यादें टटोल कर उस दौर को समझे ! वही आज के दौर में अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर कॉलेज के कैंपसों में लगते देशविरोधी नारे  " भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह  इंशाअल्लाह " , धर्म की आड़ में गौ भक्ति का चोला पहन कर एक असहाय व्यक्ति को पीट पीट के मार  देने और  विरोध की ओछी राजनीती कर मुख्य विपक्ष राजनीती दल द्वारा किसी धर्म की आस्था को चोट पहुंचा कर सरे आम बीफ खाने तक की बदलती इस अभियक्ति की आज़ादी और गौ रक्षको की गुंडागर्दी के बीच एक संजीदा और मझे हुए कलाकार नसरुदीन शाह का बेबस होकर यह कहना की मुझे डर है की भीड़ एक दिन कहीं मेरे बच्चे को ना घेर ले ! इस बदलती हुई आज़ादी की मांग के दौर के मायने क्या है आइये समझते है !


स्टेट इमरजेंसी " लोकतंत्र का काला अध्याय " :

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  " बाद मुद्दत के मिले है दीवाने
कहने सुनने को बोहोत है अफ़साने
खुली हवा में जरा सांस तो लेले
कब तक रहेगी आज़ादी कौन जाने !"

भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इमरजेंसी के 18  माह जेल में बिताने के बाद यह पंक्तिया दिल्ली के रामलीला मैदान में भीड़ को सम्बोधित करते हुए कहीं थी !

मामला 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती  इन्दिरा गांधी अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी राज नारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। उनकी दलील थी कि  इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया, तय सीमा से अधिक खर्च किए और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए ग़लत तरीकों का इस्तेमाल किय। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया। इसके बावजूद इंदिरा गांधी टस से मस नहीं हुईं। यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी ने भी बयान जारी कर कहा कि इंदिरा का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है। 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दोषी पाया और छह साल के लिए पद से बेदखल कर दिया। इंदिरा गांधी पर वोटरों को घूस देना, सरकारी मशनरी का गलत इस्तेमाल, सरकारी संसाधनों का गलत इस्तेमाल जैसे 14 आरोप लगे थे। राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी के हाथों हारने के बाद मामला दाखिल कराया था। जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने यह फैसला सुनाया था। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश बरकरार रखा, लेकिन इंदिरा को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने की इजाजत दी। 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा के इस्तीफा देने तक देश भर में रोज प्रदर्शन करने का आहवान किया। उसी दिन राष्ट्रपति के अध्यादेश पास करने के बाद सरकार ने आपातकाल लागू कर दिया।


26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। तत्कालीन राष्ट्रपति श्री  फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती  इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई। इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया और प्रेस पर प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रधानमंत्री के बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया। जयप्रकाश नारायण ने इसे 'भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि' कहा था।

इमरजेंसी के इस दौर में विरोध की हर आवाज़ को दबाई गयी ! प्रेस की  भी लिखने बोलने की स्वतंत्रता छीन ली गयी !  अभियक्ति की आज़ादी के नाम पर लोगो को अप्रत्याशित सज़ा सुनाई गयी ! विरोध करने वाले नेता अभिनेता को जेल जाना पड़ा ! इमरजेंसी के उस दौर में करीब 22  लोगो की मृत्यु हुई  और कईयो को असहाय पीड़ा दी गयी !

इमरजेंसी के इस दौर को याद करते हुए  एक व्यक्ति ने जिसकी उम्र उस समय 14  वर्ष थी ने लिखा है की जब प्रधानमंत्री द्वारा रेडियो पर की गयी इस घोषणा के पश्चात अपने पिताजी से इमरजेंसी के बारे में जानना चाहा तो उनके पिताजी ने इस प्रकार समझाया की अब हम सरकार के अधीन है ! हमारी  अधिकारों के लिए बोलने की स्वतंत्रता , कुछ वस्तु के क्रय करने की स्वतंत्रता , इधर उधर जाने की स्वतंत्रता अब सरकार के अधीन है !

आज के दौर की अभिव्यक्ति की आज़ादी  :

लोकतंत्र के इस काले दौर के बाद लोकतंत्र एक बार फिर बहाल हुआ कई राजनीतिक उथापोह के बावजूद आज हम अभिव्यक्ति की आज़ादी के उस दौर में जहां विरोध जताने के तरीके तो है परन्तु क्या हम उसका सही उपयोग कर पा रहे है और क्या किसी सरकार के विरोध के लिए ओछी राजनीती का प्रयोग कर हम धार्मिक उन्माद को बढ़ावा नहीं दे रहे ! अभियक्ति के आज़ादी के अलग अलग घटनाक्रम सामने आ रहे है तो क्या इसी अभियक्ति की आज़ादी के मायने गढ़ हम भारत के नए उदय की संकल्पना देख रहे है!  

  1. देश विरोधी नारे :  जे एन यु कॉलेज परिसर एवं पूर्वोत्तर में हुए घटनाक्रम से आप सब अवगत है ! सरकार की गलत  नीतियों का विरोध करना एक जिम्मेदार नागरिक का दाहित्व और छात्र जीवन में में देश हित में आंदोलन में हिस्सा लेना बहुत ही अच्छा कदम है पर वही सरकार का विरोध करते करते देश विरोधी नारो के समर्थन में खड़ा होना और पुकारना देश की अखंडता एवं सम्प्रभुता पर सवाल है ! अपने ही देश के टुकड़े करने की नारो  को अभिव्यक्ति की आज़ादी कहना अभिशाप है !


  1. गौ रक्षको की गुंडागर्दी :  अपने गाय के प्रति अथाह प्रेम को दर्शाते ये तथाकथित गौ रक्षक  जब वो ही गाय घायल शरीर या सींग को लेकर जब गलियों में घूमती है और वही गाय भूखे होने पर  उन्ही के द्वारा फेके गए प्लास्टिक को खाकर दम तोड़ती है तब किसी का ध्यान नहीं जाता परन्तु किसी धर्म विशेष के व्यक्ति द्वारा बीफ खाने के महज़ कोरी अफवाह को लेकर ये धर्म के महान रक्षक उसे पिट पिट कर मार डालते है ! इस तरह की धार्मिक आज़ादी भी सामाजिक सौहार्द के लिए बड़ा खतरा है !


  1. विरोध की ओछी राजनीती :  एक शहीद की बेटी द्वारा यह कहे जाने पर की वो आरएसएस एवं भाजपा की नीतियों का विरोध करती है उसे इन्ही के चेलो चपाटो द्वारा  सामूहिक  बलात्कार की धमकी सोशल मीडिया द्वारा ही पेल दी जाती है और वही विपक्ष की पार्टी के कई गणमान्य सदस्य भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाने वालो के साथ मंच शेयर करते नज़र आते है !  और अपने आप को आम आदमी पार्टी कहने वाले पार्टी के मुखिया तो भारतीय फौज द्वारा कि गयी सर्जिकल स्ट्राइक पर ही सवाल खड़े कर देते है ! यही नहीं किसी एक दल और सरकार के विरोध करने के लिए खुलेआम एक पशु की हत्या कर धर्म की भावनाओ को आहात पहुंचाई जाती है !  राजनीतिक पार्टियों की इस तरह की ओछी राजनीती भी देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी की स्वंतंत्रता के लिए जहर है !


दोस्तों सरकार आएंगी जाएंगी पार्टिया बनेगी बिगड़ेंगी परन्तु इस देश का लोकतंत्र सदैव बना रहना चाहिए ! आज की युवा पीढ़ी एवं प्रत्येक नागरिक को ये समझना होगा की वास्तव में अभियक्ति की आज़ादी ,बोलने की स्वतंत्रता  तो हो पर न ही वो देश के खिलाफ न ही इस पंथ एवं धर्म निरपेक्ष भारत के किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ !

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Comments

  1. maan gye kya likha hai !!!! Waah Waah

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  2. you exposed it very well.. mind blowing keep it up

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  3. the politics is a very dirty game,at least in India.

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  4. Narendra modi is best Prime minister of india

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  5. pointing fingers at religion and putting a ban on the food is so senseless.

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